अधिगमकर्ता का विकास

विकास-  शिक्षा मनोविज्ञान में  शैशवावस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक बालक के विकास का अध्ययन किया जाता है|reet exam विशेष|

अभिवृद्धि एवम् विकास का अर्थ-सामान्य रूप से अभिवृद्धि  शब्द का प्रयोग शरीर एवम् उसके अंगों के भार एवम् आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है जबकि विकास में मानसिक वृद्धि,शारीरिक वृद्धि,संवेगात्मक परिपक्वता,बौद्धिक परिपक्वता का अध्ययन किया जाता है|

वृद्धि एवम् विकास में अंतर

वृद्धि विकास
विशेष आयु तक चलने वाली प्रक्रिया जन्म से मृत्यु तक चलने वाली प्रक्रिया
परिणात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तन एवम् परिणात्मक
वृद्धि विकास का एक चरण विकास में वृद्धि भी सम्मिलित
परिवर्तनों को देखा या नापा जा सकता है परिणामों को देखा या नापा नहीं जा सकता है केवल अनुभव किया जा सकता है
केवल शारीरिक परिवर्तन सम्पूर्ण परिवर्तन सम्मिलित

“बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्भकाल के प्रारंभ से किशोर अवस्था की प्रारंभिक अवस्था तक करता है|”  – क्रो और क्रो

विकास को प्रभावित करने वाले कारक –

परिवार- बालक का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उसके परिवार की स्तिथि क्या है ? प्राय: देखा जाता है कि जिस बालक की पारिवारिक स्तिथि मजबूत होती है उनका विकास आसानी से  होता है  और कमजोर स्तिथि वाले परिवार के  बालक  का विकास पूर्ण रूप से नहीं हो पता है|

विद्यालय- बालक के विकास को प्रभावित करने  में विद्यालय बहुत ही महत्वपूर्ण कारक माना जाता है| ‘विद्यालय समाजीकरण का सक्रीय साधन है|’

वंशानुक्रम– बालक के विकास में वंशानुक्रम का बहुत ही ज्यादा प्रभाव पड़ता हम देखते है कि जिस बालक के माता-पिता  या दादा – दादी हृस्ट-पुष्ट होते है उनके बालक भी उन्ही की तरह होते है|

वतावरण- वातावरण का भी भाहूत ही ज्यादा प्रभाव पड़ता है जो बालक स्वच्छ वातावरण में रहता है उसका मानसिक और बोद्धिक विकास उचित रूप से होता है|

पोषण – शारीरिक विकास पर पोषण का बहुत ही ज्यादा प्रभाव पड़ता है, जिस बालक को स्वच्छ भोजन उपलब्ध होता है उसका विकास उचित होता है|

लिंग-भेद,अन्तःस्त्रावी ग्रंथिया,आस-पड़ोस का वातावरण,रोग एवं चोट

बालक का विकास अधिगम का ही परिणाम माना जाता है|

बालक अनुभवों या अधिगम द्वारा जो अर्जित करता है उसे सामाजिक गुण कहते है|

“विकास वंशानुक्रम के उपहार तथा वातावरण के सामाजिक एवं सांस्कृतिक बलों की अंत:क्रिया पर आधारित है|परिपक्वता कच्चा माल प्रदान करती है तथा काफी हद तक ये निर्धारित करती है के बालक के व्यवहार के प्रतिमान और व्यवहार के क्रम क्या होंगे|”–हरलॉक  

जब बालक ,विकास की एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करता है,तब उसमे कुछ परिवर्तन दिखते है| अध्ययनों ने ये सिद्ध कर दिया  है कि ये परिवर्तन निश्चित सिद्धांतों के अनुसार ही होते है| इन्ही को विकास के सिद्धांत कहते है|–गैरिसन

विकास के विभिन्न सिद्धांत

निरंतर विकास का सिद्धांत – विकास की गति भिन्न होती है|

“विकास की निरंतरता का सिद्धात इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई आकस्मिक परिवर्तन नहीं होता है|”—-स्किनर

व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है इसकी गति कभी तीव्र तो कभी मंद रहती है|

0-3 वर्षों में विकास की गति बहुत तीव्र होती है|

3-11 वर्ष तक मंद

12-18 विकास की गति तीव्र

18 के बाद विकास की गति मंद

विकास क्रम का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार बालक गामक और भाषा सम्बन्धी विकास एक निश्चित क्रम में होता है

जन्म के समय बालक रोना सिखता है| 3 माह का होता है तो वह गले से विशेष प्रकार की आवाजे निकलता है| 7 माह का शिशु अपने माता -पिता के लिए ‘पा’ ‘माँ’ आदि शब्दों का प्रयोग करने लगता है|

विकास सामान्य से विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा होता है-

“विकास की सब अवस्थाओं में बालक की प्रतिक्रियाये विशिष्ट बनाने से पूर्व सामान्य प्रकार की होती है|”–हरलॉक

नवजात शिशु किसी वस्तु को पकड़ने के लिए किसी विशेष अंग का प्रयोग  करने से पूर्व अपने शरीर का सञ्चालन करता है|

एकीकरण का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार बालक सबसे पहले सम्पूर्ण अंग को चलना सिखता है उसके बाद अंग के किसी भाग को चलाना सिखता है उसके बाद वह उन अंगो को एक साथ  चलाना सिखाता है|

“विकास में पूर्ण अंगों की ओर,एवं अंगों से पूर्ण की ओर गति निहित होती है| विभिन्न अंगों का एकीकरण ही गतियों की सरलता  को सफल बनाता है|”–कुप्पुस्वामी

वैयक्तित्व विभिन्नताओं का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक बालक और बालिका का विकास का अपना स्वयं का स्वरूप होता है,इस स्वरूप में वैयक्तित्व विभिन्नता पाई जाती है| एक ही आयु के दो बालक या बालिकाओं के शारीरिक,मानसिक,सामाजिक आदि विकास में वैयक्तित्व विभिन्नताओं को स्थिति स्पष्ट दिखाई देती है|

“विकास के स्वरूपों में व्यापक वैयक्तित्व विभिन्नताए होती है|”–स्किनर

विकास का वर्तुलाकार सिद्धांत –इस सिद्धांत के अनुसार विकास लम्बवत न होकर वर्तुलाकार होता है|एक व्यक्ति सीधा चलकर विकास नहीं कर सकता है बल्कि आगे बढेगा उसके पच्चात पीछे आएगा उसके पश्चात् पुनः आगे बढेगा|

वृद्धि और विकास वंशानुक्रम और वातावरण की अंत:क्रिया का परिणाम –ये सिद्धांत कहता है की बालक का विकास न केवल वंशानुक्रम और न केवल वातावरण के कारन होता है बल्कि विकास विकास वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम है|

“यह सिद्ध किया जा चुका है कि वंशानुक्रम उन सीमाओं को निश्चित करता है,जिनके आगे बालक का विकास नहीं किया जा सकता है| इसी प्रकार ,यह भी  प्रमाणित किया जा चुका है कि जीवन के प्रारंभिक वर्षों में दूषित वातावरण ,कुपोषण,या गंभीर रोग जन्मजात योग्यताओं को कुंठित या निर्बल बना सकते है|”–स्किनर

मस्तकधोमुखी क्रम या सेफेलोकोडल थ्योरी-इसे सिर से पैर की और विकास का सिद्धात कहते है| इस सिद्धांत के अनुसार बालक का विकास सिर से पैर की और होता है|

निकट से दूर का सिद्धांत या प्रोक्सिमोडीस्तल थ्योरी –इस सिद्धांत के अनुसार विकास मध्य से बहार की ओर एवं केंद्र से सिरों की ओर होता है|

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार बालक के शारीरिक,मानसिक,संवेगात्मक,आदि के विकास परस्पर सम्बंधित होते है|जब बालक का शारीरिक विकास  होगा तो उसके साथ-साथ भषा का विकास भी होगा संवेगात्मक विकास भी होगा उसकी रुचियों में भी परिवर्तन आएगा|

“शरीर सम्बन्धी दृष्टिकोण व्यक्ति के विभिन्न अंगों के विकास में सामन्जस्य और परस्पर सम्बन्ध पर बल देता है|”–गैरिसन

प्रत्येक विकासात्मक अवस्था में अंतर्निहित खतरे होते है|

2 thoughts on “अधिगमकर्ता का विकास

  • 04/04/2018 at 1:08 PM
    Permalink

    Pichale janam Ki baat yaad aana ya aisa lgana Ki esko kahi dekha hai. Ya aage chal ke ye milega kaise pta hota .
    Aisa kyu lagta hai

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