किशोरावस्था की विशेषताएं

किशोरावस्था में सभी किशोर-किशोरियों का सामाजिक परिवेश विस्तृत ह जाता है  जिससे उनके शारीरिक मानसिक के साथ- साथ सामजिक विकास भी होता है|

किशोरावस्था में बदलते परिवेश व संबंधों के परिणामस्वरूप किशोर- किशोरिया नए वातावरण में समायोजित होने का प्रयास करते है|

समूहों का निर्माण- किशोरावस्था में किशोर व किशोरिया समूहों का निर्माण करने लग जाते है ये समूह स्थाई होते है| सभी किशोर-किशोरिया अपनी रूचि के अनुरूप समुहो में जुड़ जाते है जिसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन होता है|

मैत्री भावना का विकास– किशोरावस्था में मैत्री भावना का विकास हो जाता है जिससे किशोर- किशोरिया अपनी रूचि के अनुरूप मित्र बनाने लग जाते है| इस अवस्था में सामान्यतः किशोर,किशोरी के साथ और किशोरिया,किशोर के साथ मित्रता करना पसनद करते है |इस अवस्था में समस्त किशोर- किशोरियां अपने मित्र के सामने सजधज कर एक दुसरे के सामने आते है|

समूह के प्रति भक्तिकिशोर- किशोरियों का अपने समूह के प्रति अत्यधिक भक्ति भाव होता है अपने समूह के समस्त सदस्यों का आचार- विचार, वेश-भूषा, तौर-तरीके सामान होते है|

सामाजिक गुणों का विकास- इस में किशोर- किशोरियों में सामाजिक गुण जैसे उत्साह, सहानुभूति,सहयोग,सद्भावना,नेतृत्व आदि का विकास होता है|उनकी इच्छा समूह में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करने की होती है|

सामजिक परिपक्वता की भावना का विकास- इस अवस्था में किशोर- किशोरिया अपने आप को व्यस्क दिखाने का प्रयास करते है| वे अपने कार्यों तथा व्यवहारों द्वारा समाज में सम्मान प्राप्त करना चाहते है|वे समाज के प्रति अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व का निर्वाह करने का प्रयास करते है|

विद्रोह की भावना- इस अवस्था में अपने माता-पिता और परिवार से संघर्ष अथवा मतभेद करने की प्रवृति आ जाती है|जब उनकी स्वतंत्रता का हनन किया जाता है तो उनके द्वारा विद्रोह किया जाता है|व्यवसाय चयन में रूचि- इस अवस्था में भावी जीवन के व्यवसाय चयन में उनकी रूचि होती है|ये उन व्यवसायों को अपनाना चाहते है जिनमे धन,सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक हो|

बहिर्मुखी प्रवृति- इस अवस्था में संगीत, कला,समाज सेवा,जनसंपर्क आदि में ये रूचि लेने लगते है|

राजनैतिक दलों का प्रभाव- किसी एक दल के अनुयायी बन जाते है  और उस दल के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति दिखाते है|

किशोरावस्था में विकास

सामाजिक विकास

किशोरावस्था में सभी किशोर-किशोरियों का सामाजिक परिवेश विस्तृत ह जाता है  जिससे उनके शारीरिक मानसिक के साथ- साथ सामजिक विकास भी होता है| किशोरावस्था में बदलते परिवेश व संबंधों के परिणामस्वरूप किशोर- किशोरिया नए वातावरण में समायोजित होने का प्रयास करते है|समूहों का निर्माण- किशोरावस्था में किशोर व किशोरिया समूहों का निर्माण करने लग जाते है ये समूह स्थाई होते है| सभी किशोर-किशोरिया अपनी रूचि के अनुरूप समुहो में जुड़ जाते है जिसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन होता है|

 भावना का विकास-मैत्री किशोरावस्था में मैत्री भावना का विकास हो जाता है जिससे किशोर- किशोरिया अपनी रूचि के अनुरूप मित्र बनाने लग जाते है| इस अवस्था में सामान्यतः किशोर,किशोरी के साथ और किशोरिया,किशोर के साथ मित्रता करना पसनद करते है |इस अवस्था में समस्त किशोर- किशोरियां अपने मित्र के सामने सजधज कर एक दुसरे के सामने आते है|

समूह के प्रति भक्ति- किशोर- किशोरियों का अपने समूह के प्रति अत्यधिक भक्ति भाव होता है अपने समूह के समस्त सदस्यों का आचार- विचार, वेश-भूषा, तौर-तरीके सामान होते है|सामाजिक गुणों का विकास- इस में किशोर- किशोरियों में सामाजिक गुण जैसे उत्साह, सहानुभूति,सहयोग,सद्भावना,नेतृत्व आदि का विकास होता है|उनकी इच्छा समूह में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करने की होती है|

सामजिक परिपक्वता की भावना का विकास- इस अवस्था में किशोर- किशोरिया अपने आप को व्यस्क दिखाने का प्रयास करते है| वे अपने कार्यों तथा व्यवहारों द्वारा समाज में सम्मान प्राप्त करना चाहते है| वे समाज के प्रति अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व का निर्वाह करने का प्रयास करते है|विद्रोह की भावना- इस अवस्था में अपने माता-पिता और परिवार से संघर्ष अथवा मतभेद करने की प्रवृति आ जाती है|  जब उनकी स्वतंत्रता का हनन किया जाता है तो उनके द्वारा विद्रोह किया जाता है|व्यवसाय चयन में रूचि- इस अवस्था में भावी जीवन के व्यवसाय चयन में उनकी रूचि होती है|ये उन व्यवसायों को अपनाना चाहते है जिनमे धन,सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक हो|

बहिर्मुखी प्रवृति- इस अवस्था में संगीत, कला , समाज सेवा , जनसंपर्क आदि में ये रूचि लेने लगते राजनैतिक दलों का प्रभाव- किसी एक दल के अनुयायी बन जाते है  और उस दल के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति दिखाते है|

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