नैतिक विकास का सिद्धांत

कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत

हमारे सोच,व्यव्हार और भावनाओं में सही या गलत का बदलाव नैतिक विकास के अन्दर आता है|
एक व्यक्ति नैतिक निर्णय लेते समय कौन कौन से तर्क या वितर्क को ध्यान में रखता है|व्यक्ति नैतिक परिस्थियों में कैसा व्यवहार करता है |नैतिक मुद्दों के बारे में लोग क्या सोचते है|

क्या है जो एक व्यक्ति का  नैतिक व्यक्तित्व बनाने के लिए जिम्मेदार होता है|

पियाजे का सिद्धांत – पियाजे ने 4-12 वर्ष के वच्चों का अवलोकन और साक्षात्कार किया

पियाजे  ने कंचे खेलते हुये बच्चों को देखा ताकि ये जान सके कि बच्चे खेल के नियमों पर किस तरह के विचार रखते है| उन्होंने उन बच्चों से नैतिक मुद्दों के बारे में भी बात की जैसे की चोरी,सजा और न्याय|

पियाजे ने पाया कि बच्चे नैतिकता के बारे में सोचते है तो वे दो अलग अलग अवस्थाओं से होकर गुजरते है|

1 बाहरी सत्ता से प्राप्त नैतिकता

2 स्वायतत्ता पर पर आधारित नैतिकता

1 बाहरी सत्ता से प्राप्त नैतिकता- इस तरह सोचना का ढंग 4-7 वर्ष के बच्चों का होता है|  इस अवस्था में  बच्चे मानते है कि न्याय और नियम दुनिया के न बदलने वाले गुणधर्म है,एसी चीज जो लोगों के वश के बाहर है|

7-10 वर्ष के बच्चे नैतिक चिंतन की पहली और दूसरी अवस्था की मिली-जुली स्तिथि में होते है|

2 स्वायतत्ता पर आधारित- 10 वर्ष या इससे बड़े बच्चे स्वायतत्ता पर आधारित नैतिकता दिखाते है|  वो ये जानते है कि नियम और कानून लोगो के द्वारा बनाये हुए है और वे किसी कार्य का मूल्यांकन करने में वे वे करने वाले व्यक्ति की परिस्तिथि और परिणामों के उपर भी विचार करते है|

कोहाल्बर्ग का सिद्धांत 

कोहाल्बर्ग ने भी पियाजे की तरह बताया कि नैतिक विकास कुछ अवस्थाओं से होता है| कोहाल्बर्ग ने पाया कि ये अवस्थाएं सार्वभौमिक होती है|उन्होंने इस बात का निर्णय 20 वर्ष के बच्चों के साक्षात्कार से कर पाए| कोहाल्बर्ग ने बच्चों को 11 कहानियां सुनाई जिसमे कहानी के पत्र कुछ नैतिक उलझन में होते है|उस कहानी को सुनकर प्रश्नों के उत्तरों के आधार पर कोहाल्बर्ग ने नैतिक विकास की 3 अवस्थाएं बताई–

1 रुढि पूर्व अवस्था में चिंतन

2 रूढिगत चिंतन

3 रुढि से ऊपर उठकर नैतिक चिंतन

कोहाल्बर्ग ने प्रत्येक अवस्था को 2 चरणों में बांटा है|

1  रुढि पूर्व अवस्था में चिंतन नैतिक चिंतन का सबसे निचला चरण, इस अवस्था में क्या सही है क्या गलत, बाहर से मिलने वाली सजा और उपहार पर निर्भर करता है|

(प्रथम चरण)– बहरी सत्ता पर आधारित- इस चरण में नैतिक सोच सजा से बंधी हुई होती है| बड़ो की बात माननी चाहिए नहीं तो वो दण्डित करेंगे|

(द्वितीय चरण)-व्यक्ति केन्द्रित, एक दुसरे का हित साधने पर आधारित नैतिक चिंतन–वाही बात सही है जिसमे बराबरी का लेन देन हो रहा हो| अगर हम दुसरे की इच्छा पूरी कर दे तो दुसरे हमारी इच्छा पूरी करेंगे|

2 रूढिगत चिंतन– कोहाल्बर्ग के नीति विकास के सिद्धांतों की दूसरी अवस्था है| इस अवस्था में लोग एक पूर्व आधारित सोच से चीजों को देखते है| जैसे बच्चों का व्यवहार उनके माता-पिता या किसी बड़े व्यक्ति द्वारा बनाये गए नियमों पर आधारित होता है|

(तृतीय चरण)– अच्छे आपसी व्यवहार व संबंधों पर आधारित नैतिक चिंतन- इस अवस्था में लोग विश्वास,दूसरों का ख्याल रखना,दूसरों से निष्पक्ष व्यवहार को अपने नैतिक व्यव्हार का आधार मानते है|  इस अवस्था में बालक अपने माता- पिता की  नजर में एक अच्छा लड़का बनने की कौशिश करते है|

(चतुर्थ चरण)सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने पर आधारित चिंतन-  इस स्तिथि में लोगों में नैतिक निर्णय सामाजिक आदेश,कानून और न्याय,और कर्तव्यों पर आधारित होते है| किशोर का सोचना होता है कि समाज अच्छे से चले इसलिए सबको समाज के दायरे अन्दर ही रहना चाहिए|

3 रुढि से ऊपर उठकर नैतिक चिंतन–  (पांचवा चरण)— सामाजिक अनुबंध,उपयोगिता और व्यक्तिगत अधिकारों पर आधारित नैतिक चिंतन – इस अवस्था में व्यक्ति ये सोचने लगता है कि कुछ मूल्य,सिद्धांत और अधिकार कानून से भी ऊपर हो सकते है| व्यक्ति वास्तविक कानूनों व सामाजिक व्यवस्थाओं का मूल्याङ्कन इस दृष्टि से करने लगता है कि वे किस हद तक मूलभूत मानव अधिकारों व मूल्यों का संरक्षण करते है|

(षष्ठं चरण)--सार्वभौमिक नीतिसम्मत सिद्धांतों पर आधारित नैतिक चिंतन- कोहाल्बर्ग के सिद्धांत की सबसे उच्च अवस्था| इस अवस्था में जब कोई कानून और अंतरात्मा के द्वंद्व में फंस जाता है तो वह व्यक्ति यह तर्क करता है की अंतरात्मा की आवाज  के साथ चलना चाहिए, चाहे वह निर्णय जोखिम से भरा ही क्यों न हो|

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